शिक्षा का बाज़ारीकरण

आज के युग में शिक्षा का पुरी तरह से बाज़ारीकरण कर दिया गया है. बच्चा होंने से पहले ही ये तय किया जाने लगाहै कि बच्चे को पढने के लिये कहाँ भेजना है . यहाँ तक कि बच्चे का डिलिवरी डेट भी उसके स्कूल एडमिशन के हिसाब से मैनेज किया जाने लगा है . ये तो हद है सम्वेदनशिलता की. क्या हम शहरों में रहने वाले लोग अतिसम्वेदनशील हो गये है बच्चों को लेकर ? क्या गाँव में भी इतनी सम्वेदनशिलता नही है बच्चों की परवरिश में. ऐसा लगता है जैसे सब डरे हुए है एक अनजाने डर से. जितना जल्दी हो सके अपने बच्चों को स्कूल में डाल देना चाहते है , हालात तो ये है कि बच्चे 1.5 से 2.0 साल होते-होते स्कूल में होते है. बच्चों का बचपना मारा जा रहा है और ये हम सब अपने आंखो के सामने होते हुए देख रहे है और कर कुछ नही पा रहे है . हमारी इसी डर और अनदेखापन ने समाज को एक नये बाज़ार की तरफ़ मोड़ दिया है जो धीरे -धीरे शहरों से होते हुए गाँव में भी पहुचने लगा है. आज हर जगह अँग्रेजी माध्यम के हज़ारों -लाखों की संख्या में पब्लिक स्कूल खुल गये है . शहरों में तो ये एक विकराल रुप धारण कर लिया है जो अनेक रुप सामने आ रही है . मनमाने ढंग से पैसों की उगाही की जा रही है . हर साल एडमिशन के नाम पर अभिभावको पर अनावश्यक दबाव बनाया जाता है ,एक बच्चे के एडमिशन के लिये पांच जगह से फोर्म भरने के लिये मजबूर किया जाता है. यूनिफोर्म, किताब और एक्स्ट्रा कुरीकलम के नाम पर हर साल पैसो के लूटमलुट मची है. 

शिक्षा के नाम पर बच्चों के उपर इतना लोड दे दिया जाता है कि बच्चा खेल कूद से मरहुम हो जाते है . आये दिन समाचार पत्रों में बच्चों के हिंसक होने की खबरे आती रहती है जो इसका दुष्परिणाम है . इस तरह के शिक्षा प्रणाली पर रोक लगाने की जरुरत है . 

आपका,

meranazriya.blogspot.com

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