संज़िदा

हाँ थोडा संजीदा हूँ,

यू ही मुस्कुराने की कला आती नही मुझे ,

शायद इसीलिए धोखा खा जाता हूँ,

चेहरे पे चेहरा रखना आता नही ,

नकली बनकर हँसाना भी नही आता,

थोडा धीर हूँ और गंभीर भी,

शायाद यही गच्चा खा जाता हूँ,

सच में भरोशा करता हूँ ,

झूठ कभी बोलता नही ,

छल कपट मुझे आता नही ,

शायद ये कर पाता तो राहें आसान होती ,

लेकिन खुद को ये समझा ना सका,

और ना ही समझा पाऊँगा ,

गलत राह पकड़कर कभी आगे बढूँगा नही ,

जो हूँ…. वही रहूँगा बदलूँगा कभी नही ,

ज़िद्दी भी हूँ, जो सोचा उसे पाने की ज़िद भी है ,

लोग कहते है “परिश्रम सफलता की कुंजी है ”

भरोशा है मुझे इस लाईन पर,

सही साबित करूँगा ,है भरोशा खुद में
आपका,

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2 thoughts on “संज़िदा

  1. After reading your wonderful poem i just tried to extend the four lines….
    चेहरे पे चेहरा रखना आता नहि,
    दुसरो के गमो पर मुस्कुराना मुझ से होता नहि,
    लोग तो भूल जाते है यहाँ अपनों को भी,
    मै तो परायो को भी अनजाने में दर्द देने से घबराया करता हुँ!!!

    Liked by 1 person

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